अपने भीतर गांधी को तलाशिये

rajeev bora

1. गांधी जी कहते थे कि जब अनुत्पादक कामों पर पैसा खर्च होता है तो सर्वाधिक असर गरीबों पर पड़ता है. यही हो रहा है.
2. गांधी ने हिंद स्वराज में कहा था कि धीरे-धीरे शहरों में इतनी गंदी बस्तियां बस जायेंगी कि जीवन नर्क हो जाएगा.
3. भले ही गांधी जी के राम की परिभाषा से आज लोग अवगत न होंलेकिन गांधी के विचारों की प्रासंगिकता हर मुद्दे में है.
महात्मा गांधी जी को लेकर एक धारणा आम हो गयी है कि जब भी गांधी जयंती आती है तो उनकी प्रासंगिकता को ढूंढ़ा जाता है. परसों ही   रामजन्मभूमि बाबरी मसजिद पर फ़ैसला आया है. जाहिर सी बात है कि आज इसमें गांधी की प्रासंगिकता खोजी जायेगी. मैं इस फ़ैसले को गांधी जी ओर नहीं मोड़ रहा हूं. लेकिन हमें पहले यह समझना होगा कि क्या गांधी के राम  दशरथ पुत्र राम ही थे. इसलिए गांधी जी की विचारधारा को इस फ़ैसले से जोड़कर न देखा जाए.

हां
गांधी जी चाहते थे कि ऐसे किसी मसले में जब दो संप्रदायों का अहम टकराए तब एक को कुछ न कुछ छोड़ना पड़ता है. छोड़ने की भूमिका निभानी पड़ती है. ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि इस मसले का हल ढूंढ़ने के लिए यह भूमिका निभायी जाए. इसलिए क्योंकि हमारा जीवन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा है. मंदिर या मसजिद में पूजा करके हम ईश्वर या अल्लाह के करीब जाते हैं.

जिनके लिए गांधी ने हमेशा कहा है कि ईश्वर अल्लाह तेरो नाम. हम इन दोनों को एकाकार करके देखेंगे तभी ऐसे किसी भी मसले का हल खोजा जा सकता है.सच में अगर आज गांधी की प्रासंगिकता खोजी जाए
तो अयोध्या के फ़ैसले के बाद जो संयम और शालीनता दिखी वह पूरी तरह से हमें गांधीवाद की ओर ले जाती है.

इसलाम के ज्यादातर विचारकों ने भी इस फ़ैसले का स्वागत किया. हिन्दू और मुसलमान
दोनों ही धर्म के लोगों ने यह साबित किया कि अवाम में राष्ट्र को जोड़ने वाली सम्मानीय भूमिका अभी गायब नहीं हुई है. कई बार जब पूरे तंत्र तो हिला देने वाले मुद्दे खड़े हो जाते हैं तो न्याय की दृष्टि की परख होती है. यह न्याय इस बार जनता ने कहीं बेहतर किया है.

दृष्टि उनकी मजबूत हुई है.लेकिन हमारे तंत्र की जो दशा है उसमें हालात आम आदमी की दृष्टि से नहीं दिल्ली से तय किये जाते हैं. दिल्ली ही कॉमन (आम) के वेल्थ पर कॉमनवेल्थ कराती है और उन्हीं आम आदमी को ठगा-सा महसूस करने को मजबूर करती है. गांधी जी मानते थे कि देश के किसी हिस्से में अगर दुख-दर्द है
तो दूसरे हिस्से को वह दर्द बंटाने में शामिल होना चाहिए.
1947 में जब देश आजाद हुआ और दिल्ली जश्न मना रही थी तब गांधी जी दिल्ली में नहीं नोआखली में थे. क्योंकि वे जानते थे कि दिल्ली में हो रहे इस जश्न के कोई मायने नहीं है अगर नोआखली में लोग समस्याओं से जूझ रहे हैं.गांधी जी कहा करते थे कि जब अनुत्पादक कामों पर पैसा खर्च होता है तो इसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है. यही आज हो रहा है.

खेलों के नाम पर जो टैक्स लगे
महंगाई बढ़ीउनका दंश तो आम आदमी ही ङोल रहा है. गांधी जी चाहते थे कि पहले मूलभूत जरूरतें पूरी होंफ़िर उनसे आगे निकलने की बात की जाए.अर्थशास्त्र का सीधा-सा सिद्धांत है कि अगर उत्पाद जरूरत के मद्देनजर हो तो उसका ड्रेन नहीं होगा.

इस सामान्य से विवेक से हटकर चलने पर ही सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं. गांधी जी चाहते थे कि स्वायत्त उत्पाद हो तो आम आदमी के हाथ में पूंजी आएगी. लेकिन हो रहा है इसके उलट. मशीन का सहारा हासिल करने के लिए आम आदमी शहर तो आ जा रहा है
लेकिन उत्पाद का लाभ उसके हाथ में नहीं.

गांधी ने हिंद स्वराज में कहा था कि धीरे-धीरे शहरों में इतनी गंदी बस्तियां बस जायेंगी कि जीवन नर्क हो जाएगा. यही आज हो रहा है. वास्तव में हमने अव्यवस्था पचा लेने की आदत बना ली है. यही वजह है कि गांधी जी के इन विचारों को देश भूल रहा है. ऐसा नहीं है कि इन भूलते हुए सिद्धांतों को वापस नहीं लाया जा सकता. 
अक्तूबर को गांधी हमारे सामने आ जाते हैं. मन में तमन्ना है तभी तो हम उनको याद कर रहे हैं.

वास्तव में इस तमन्ना को प्रामाणिक होना चाहिए. अगर यह भी माना जाए कि गांधी जयंती रस्मी चीज होकर रह गई है तो इसी रस्म के बीच से गांधी के सिद्धांतों का रास्ता भी निकलता है.दरअसल पिछले 
150 सालों की शिक्षा-दीक्षा में हमने मान लिया कि पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है. यह बौद्धिक प्रमाद है. इस देश के पास आज भी जो अर्थनीति और राजनीति है वह पश्चिमी देशों से कहीं बेहतर है. यह सभी स्तरों पर है. 
मुङो नहीं लगता कि यह सब कहीं बहुत पीछे छूटा है. हममें इसे वापस लाने की सार्मथ्य है
,लेकिन वह अंदर कहीं छिपी हुई है.मैं फ़िर वहीं बात दोहराना चाहूंगा कि गांधी जी को याद करना भले ही रस्मी रह गया होलेकिन हमारे ऊपर जो खतरा बढ़ रहा हैउससे गांधी बहुत पहले ही आगाह करा चुके थे. यह खतरा मूल आधार पर ही है.

आज यह संकट  सर्वमान्य है कि प्रलय आयेगा. पुराणों में इस बात का जिक्र मिलता है कि पृथ्वी का अंत होगा
क्योंकि प्रलय आयेगा. गांधी जी ने यही बात कही थी. आज विज्ञान इसे स्वीकार कर रहा है. अगर हमारी बुद्धि रेशनल हैतो हममें यह प्रवाह जिंदा रहना चाहिए. कोई भी चीज जब तक अपना असर नहीं छोड़ती तब तक उसके महत्व को नहीं याद किया जाता.

इसीलिए मैं कहता हूं कि जब-जब देश संकट में होता है
तब-तब गांधी का महत्व बढ़ता है.इसी महत्व को पहचानने के क्रम में एक बात और निकलकर आती है कि इस महत्व को कौन किस तरह पहचानता है. बुश जब भारत आये थे तो कई संगठन के लोग उनके राजघाट जाने का विरोध कर रहे थे. तर्क था कि गांधी जी अहिंसा के पुजारी और बुश विश्व का हिंसा के दौर में झोंकने वाले.

आज ओबामा गांधी जी का नाम ले रहे हैं. अमेरिका का हमेशा ही यह लक्ष्य रहा है कि जो व्यवस्था मजबूत रहती है वह उसी का दामन थाम लेता है. उसी के साथ चलने लगता है. सबको पता है कि अगर ओबामा गांधी का नाम लेते हैं तो उनके लिए शांति लक्ष्य नहीं है. उन्हें पता है कि गांधी के नाम को वैश्विक सहमति है. इसलिए गांधी के नाम का उपयोग करने का लक्ष्य अपनी सभ्यता को मजबूत करना है.

ओबामा ने नोबेल पुरस्कार लेने के बाद जो स्पीच दी थी उसमें भी उन्होंने युद्ध की पैरोकारी की थी. तो अगर इस दोष को छिपाने के लिए गांधी का नाम लिया जाए तो भले ही वे गांधी का नाम लें
लेकिन इसका कोई महत्व नहीं है. यही बात मैं भारतीय संदर्भो में भी कहना चाहता हूं. गांधी जी का नाम लेने से और किसी मसले के हल को उनके सिद्धांतों में खोजना लक्ष्य नहीं हो सकता.ऐसा कहने के पीछे की वजह भी है.

किसी भी चीज में से अचानक फ़ल नहीं पैदा होते. जिन दोषों की जड़ गहराई   में होती है
,उनके लिए लंबे समय तक प्रयास करना    पड़ता है. यह सभी मसलों का गांधीवादी हल है. अगर नक्सलवाद और आतंकवाद से निजात पाना है तो पहले निर्भयता का वातावरण पैदा करना जरूरी है.

फ़िर उसके लिए सतत् प्रयास. अधूरे प्रयासों से पैदा हुई असफ़लता के लिए गांधी को दोषी ठहराना संदर्भो के परे है.गांधी की प्रासंगिकता खोजने के क्रम में जो सबसे बड़ी सफ़लता यह है कि हम हर पीढ़ी में गांधी को फ़िर से लौटता हुआ पाते हैं. जब पीसी एलेक्जेंडर इंग्लैंड में गांधी जी की कुछ चिठ्ठियों की नीलामी कर रहे थे
तब भारत सरकार ने कहा था कि यह हमारी धरोहर है.

हम इसे किसी कीमत पर वापस लाएंगे. हाल ही में जब उनके चश्मे की नीलामी की बात चली
तब भी भारतीय उद्योगपति आगे आए. भले ही उनसे जुड़े प्रतीकों के सहारे हीलेकिन हम उनसे अपना जुड़ाव खोज तो रहे हैं. रीमिक्स को लेकर हमेशा यह कहा जाता है कि यह नयी पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी से परिचित करता है.

चेग्वेरा की टीशर्ट पहने दस युवा में पांच इसी बहाने से जान लेते होंगे कि यह कौन है. इसी तरह ज्वलंत मुद्दों का हल गांधीवाद में खोजना इस सिद्धांत की सफ़लता है. अयोध्या में राम मंदिर के बहाने गांधी के राम को खोजा जा रहा है. भले ही गांधी के राम की परिभाषा से लोग अवगत न हों
लेकिन गांधी की प्रासंगिकता हर मुद्दे में है. यह हर बार साबित हो जाता है.

( लेखक स्वराज पीठ ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं)

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