एक ख़त ख़ब्ती रंजन के नाम


मित्र रंजन,

अब तुम्हें "प्रिय मित्र रंजन" लिखने/मानने का मन नहीं करता क्योंकि तुमने मेरी जान के पीछे पड़ कर मुझे अपनी नयी किताब "कुँवर नटुआ दयाल" का आमुख लिखने को कहा है यह जानते हुये भी कि लिखने-पढ़ने का कार्य मुझे कतई अप्रिय लगता है. टेलीफोन विभाग में की गयी प्रायः तैतीस वर्षों की नौकरी ने इस आदत से निज़ात ही दिला रखी थी, फोन पर बात करके ही काम चल जाता था इस कारण मेरी पत्नी के पास मेरे प्रेमपत्र की कौन कहे, कागज़ का कोई टुकड़ा तक भी नहीं रहा जिसे मेरी अनुपस्थिति में वे पिया की पाती कह कर छाती से लगा कर सन्तोष कर लेतीं. इसलिये तुम अभी तो फिलहाल किसी भी कोण से प्रिय नहीं लग रहे हो. रही बात मित्र कहने की तो यह भी बड़ा कटु सत्य है कि तुमसे हुई मित्रता की जड़ें अलबत्ता इतनी गहरी चली गयीं हैं कि इन बूढ़ी हाथों से अब उखाड़े नहीं उखड़ रही. इसे काटने का भी कोई औचित्य है ही नहीं. जानता हूँ, काट भी दूँ तो साल बीतते न बीतते एक नयी फुनगी फिर उग ही आयेगी! अब अपने ही सर के बचे-खुचे बाल उखाड़ कर खीज निकाल रहा हूँ. इन अप्रिय किन्तु अपरिहार्य कारणों से तुम्हें मित्र कह कर संम्बोधित करने की औपचारिकता का निर्वाह भर कर दिया है.
रही बात तुम्हारी इस किताब की, तो इसे कई बार ख़ुद पढ़ने और शालिनी (मेरी बेटी) और उसकी माँ को एक बार ज़बरदस्ती पढ़ाने के बाद तुम्हे ख़ब्ती समझने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचा. हम सबों को इस नतीजे पर पहुँचाने में इस बिचारी किताब का कतई क़सूर नहीं, दोष तुम्हारा है-सिर्फ तुम्हारा क्योंकि मुझसे इस अद्भुत पुस्तक के बारे में कुछ लिखने का तुम्हारा आग्रह प्रायः वैसा ही है जैसे वैटिकन सिटी के पोप को श्रावण मास में, रुद्रपाठ करते हुये काँवर लेकर, नंगे पाँव सुलतानगंज से देवघर जाने को कहना! वह बेचारा इनमें श्रावण मास, रुद्रपाठ, काँवर आदि किसी की भी महत्ता नहीं जानता. वही तुम्हारी किताब को लेकर मेरी दुर्दशा है क्योंकि इसकी कथावस्तु, पात्र, काल, परिवेश आदि किसी के बारे में मैं कुछ भी तो नहीं जानता. फिर डा. अमरेन्द्र ने इसके बारे में संक्षेप में ही सही पर इतनी सटीक और सुन्दर टिप्पणी लिखी है कि किसी के पास, कम से कम मेरे पास, कहने को तो नया कुछ भी नहीं बचता. मैं इस किताब के बारे कुछ भी लिखूं तो वह किमख़ाब पर टाट के पैबन्द वाली लोकोक्ति पर, यदि लगाया जा सके तो,  लगे पैबन्द से भी बदतर होगा.
इस किताब में तो भाई, तुमने एक लुप्त प्रायः तथा रस-रंग हीन स्थानीय लोककथा को इतना विशाल कैनवास देकर एकदम से इन्द्रधनुषी बना दिया है. दरअसल थोड़ी ही देर तक पढ़ने के बाद ही मेरा ध्यान बार-बार कथानक के नूपुर की रुनझुन से हट कर इसमें अटे पड़े रहस्यों की वंशी की आलौकिक धुन में खो जाता था. पुस्तक के आरंभ में ही बिना किसी भारी-भरकम भूमिका के तुमने प्रश्नोपनिषद् के छुपे रहस्यों से पर्दा उठाने का काम बड़ी सहजता से किया है. बाद में तो तन्त्र और मंत्र शास्त्र के अत्यन्त गोपनीय और बहुआयामी पहलुओं को तुमने कितनी सरलता से उद्घाटित किया है कि इन विधाओं में गंभीर अभिरुचि रखने वालों को जैसे अनमोल ज़खीरा मिल जायेगा. मेरी जानकारी में दक्षिण भारत की भाषाओं, बाँग्ला तथा अँग्रेज़ी में छपी विदेशी पुस्तकों को छोड़ दें (क्योंकि इनके हिन्दी अनुवादों में पुस्तक का मूल स्वर कहीं-कहीं तो आर्तनाद सा सुनाई देने लगता हैहाँ पंडित ज्वाला प्रसाद तिवारी जी तथा रामकृष्ण मिशन के कई पुस्तकें मेरी इस धारणा को झुठलाती हैं) तो काशी के गोपीनाथ कविराज जी और मुँगेर के स्वामी सत्यानन्द जी के अतिरिक्त किसी अन्य ने इन विषयों पर इतनी गहराई से इन गोपनीय तथ्यों को इतनी सहजता से उद्भाषित नहीं किया है. डॉ श्रीमाली और आचार्य रजनीश की कतिपय पुस्तकों में इन विषयों पर जो चर्चायें मैने देखी हैं उनमें सिद्धान्त पक्ष बड़ा ढँका-छुपा सा है और वह साहित्य भी पंथ विशेष के अनुयाईओं को ही सहज उपलब्ध/ग्राह्य हो पाता है, शेष जिज्ञासु ओस की बून्द चाट कर अपनी प्यास बुझाते हैं. नव लामा तंत्र (जो शायद मूल बौद्ध हीनयान और महायान पन्थों से भी थोड़ा अलग होकर भौतिक समृद्धि सहित सर्वांगीण विकास की राह बताता है और नव धनाढ़्यों में बड़ा लोक प्रिय हो रहा है) या फिर श्री प्रभात रंजन सरकार का आनन्द मार्ग, क्रिया-योग, सूर्य-योग, मेधा-योग, सहज-योग, पातँजली के योग सूत्र, पुराणों और संहिताओं में यत्र-तत्र वर्णित यौगिक/ताँत्रिक  सिद्धान्तो का निचोड़ है तुम्हारी यह चमत्कारिक पुस्तक! वैसे तो पूरी पुस्तक का प्रत्येक अंश बेहद प्रभावित करता है लेकिन कापालिक टंका और कुँवर के बीच हुआ प्रश्नोत्तर मुझे बड़ा अच्छा लगा. लगा कि यह वृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित विदेह राजा जनक के सन्मुख याज्ञवल्क्य और गार्गी के बीच हुये संवाद से कम नहीं. वहाँ भी तो गार्गी ने याज्ञवल्क्य से पूछा था कि वह अक्षरतत्व ब्रह्म क्या है जिसमें आकाश प्रभृत सारी सृष्टि समाहित है? ब्रह्म को अनिर्वचनी और निर्गुण माना गया है. अब अगर याज्ञवल्क्य अक्षरतत्व का वर्णन करते हैं तो अवाच्य का वर्णन करने के दोषी होते हैं और न करें तो पराजित! ठीक वैसा ही यह रोमाँचक और विद्वतापूर्ण तुम्हारी पुस्तक का वह प्रकरण/संवाद भी बन गया है. पूरी किताब तो बहरहाल अच्छी है ही.
तुमने इतना कुछ रंग भरा है इसमें कि तुम्हारी इस मौलिक, खोजी और विद्वतापूर्ण पुस्तक पर देश का कोई भी विश्वविद्यालय तुम्हें पीएच.डी. की क्या कहूँ सीधे डी.लिट. की उपाधि भी देकर स्वंय सम्मानित होगा. तुमने इतनी सशक्त और प्रायः प्रमाणिक किताब लिखी है कि इस के बारे में कुछ भी कहने से ज़्यादा अच्छा है कि पाठकगण बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे पढ़ें और अब तक अज्ञात सी रही दुनिया के रहस्यमय संसार से स्वयं ही परिचित हो लें.
पढते समय पहले मुझे भय हुआ था कि तुम्हारी इस अद्भुत कृति को भी आँचलिक कह कर इसकी अर्थी उठाने की वैसी ही तैयारी न शुरु हो जाये जैसा रेणु की "मैला आँचल" या मनहर चौहान की "घरघुसरा" के छपने के बाद इन कालजयी रचनाओं साथ हुआ था. मैनें हिन्दी/अँग्रेज़ी में छपे, भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त कई अन्य भाषाओं के इतिहासपरक/काल्पनिक चरित्रों पर आधारित, कुछ उपन्यास/काव्य पढ़ने की भूल अवश्य की है, जिनमें "फ़ार पॉवेलियन्स","नाना","आम्रपाली","वैशाली की नगरवधू", "ययाति", "सोमनाथ", "मृगनयनी", "एक कंठ विषपायी", "रश्मिरथी", "चित्रलेखा", "रानी रुपमती और बाज़बहादुर" डॉ युगेश्वर के कई जीवनीपरक पुस्तकें आदि अनायास स्मरण हो आने वाले कुछ नाम हैं. "परती परिकथा" को छोड़ कर प्रायः इन सभी पुस्तकों  में लिखने वाले का पूर्वाग्रह कहीं न कहीं छलकता दिख ही जाता था. कई बार तो थोड़ी देर तक पढ़ने के बाद ही लेखक की निरपेक्षता का मुखौटा भी उतर जाता था और उसके अपने जीवन दर्शन की, किसी हद तक उबाऊ पुनरावृति टपकने लगती थी. पर आश्चर्य है कि तुम्हारी किताब में हर पन्ने पर मौज़ूद होकर भी तुम कहीं नहीं दिखते. यह बड़ी अजीब सी बात है कि एक दीर्घ काल तक चर्चित रहने वाली रचना का लेखक अपने आपको निरीह पाठक पर थोपने का लोभ संवरण कर सका है. सच-सच बताना रंजन, कहीं तुम भी आज के स्थापित कुछ लेखकों की तरह किसी और ग़रीब की रचना अपने नाम से तो नहीं छपवा रहे हो?   
लेकिन एक यक्षप्रश्न अब भी अनुत्तरित रहता है कि तुमने मुझसे आमुख लिखवाने की क्यों सोंची? शायद हीरु की फैलाई भ्रान्ति कि मेरी कुण्डलिनी जाग्रत है या फिर तुम्हारे कमरे में करीने से सजा कर रखी गयी तंत्र-मंत्र-योग आदि अनाप-शनाप विषयों पर रखी पुस्तकों के बारे में मेरी मूर्खतापूर्ण जिज्ञासायें, या फिर तुम्हारे ही कुटिल हृदय की कोई नयी साज़िश? मैं तो इतना हतप्रभ हूँ कि कोई दूर की कौड़ी भी नहीं ला सकता. हाँ, इस किताब की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद डॉ. अमरेन्द्र की टिप्पणी कि "......लोकगाथा नटुआ दयाल तंत्र-मंत्र की मान्यताओं पर जीवित अंगिका लोककाव्य है, जिसे आज की बुद्धि स्वीकारने में हिचकिचाएगी". पढ़ कर विशेष रुप से एक लाभ तो अवश्य हो गया है कि मेरा अब तक का तथाकथित आध्यात्मिक/तिलस्मी जीवन मेरी आँखों के आगे जीवन्त हो उठा है जहाँ हिचकिचाहट नहीं है, अविश्वास या विरोध भी नहीं है. श्रद्धा और समर्पण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है वहाँ.  
एकदम छुटपन की याद है यह, सीताबो-गुलाबो की. ये दो अधेड़, नीली आँखें और ताम्बाई रंग की झुर्रियों वाली खाल वाली ख़ानाबदोश सगी बहनें मेरी सुरक्षा कवच की तरह तैनात की गयी थीं. इन्हे मेरी दादी गलगलैनिया कहती थीं. तुम्हे भी याद होगा कि तब भागलपुर में पैसे वसूलने वाले पठान और कहीं सड़क किनारे तम्बू डाल कर रहते, छुरी-चाकू पर सान चढ़ाते, धौंकनी चला कर अँगारों से निकाल गर्म लाल लोहा पीटते जिप्सी परिवार भी बहुताय से देखे जाते थे. न जाने वे सब कहाँ खो गये अब तो उनकी सिर्फ धुँधली यादें भर रह गयीं हैं. देखो न, मैं भी किन असंगत बातों में खो गया. बात चल रही थी इन दोनों बहनों की जिन्होंने शायद अपना तम्बू वाला ठिकाना छोड़ दिया था या शायद वहाँ से निकाल दी गयीं थीं, क्योंकि ये हमारे ही घर के किसी कोने में रहती थीं. ढ़ेर सारे चान्दी या गिलट के गहने पहने, दाँतों में मिस्सी, कभी आसमान जैसी नीली और कभी गुडहल के फूल जैसी लाल आँखों से बेसाख़्ता टपक पड़ने को बेक़रार काजल और बेइन्तहा मुहब्बत भी, दोनों गालों में निहायत बेदर्दी से ठूँसे हुए पान के अलावा गुलाबो-सिताबो का बड़ा सा घाघरा भी मुझे याद है जिसमें मुझे छिपा कर न जाने वे क्या-क्या बुदबुदातीं, लाल-लाल आँखों से आकाश में उड़ते चील-कौउवों को देखतीं फिर कुछ अबूझ सा धाराप्रवाह बोलती हुई, मेरे सर की ओर से शुरु करके पाँवों तक टटोलती और अन्त में दोनों ही बहनें मेरी दोनों आँखों पर अलग-अलग फूँक मार कर मुझे खड़ा कर देतीं. तुम्हें याद होगा कि सामने से गुज़रने वाली छोटी लाईन का भागलपुर कचहरी स्टेशन मेरे घर के बहुत पास था. यह ट्रेन गंगा जी के बरारी घाट तक जाती थी जहाँ इसके आखिरी पड़ाव से भागलपुर का श्मशान घाट बहुत क़रीब था. सात आठ साल की आयु में इस मनहूस ट्रेन से उनके साथ मुझे बरारी के श्मशान घाट की बहुत बार यात्रा करनी पड़ी थी. आखिरी बार तब मैं ुनके साथ गया था जब शायद किसी तेली की मौत के बाद उसकी खोपड़ी की उन्हें ज़रुरत थी. उस दिन जब लाश प्रायः फुँक चुकी थी, पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी बहनों ने आकाश की ओर देखते हुये थोड़ी देर तक कुछ जल्दी-जल्दी बुदबुदाया और अचानक बिना किसी पूर्वाभास के घनघोर बारिश शुरु हो गई, इतनी तेज़ कि लाश फूँकने आये सभी लोग भाग खड़े हुये और दोनों बहनों ने न जाने कैसे वह खोपड़ी उठाई, उसे झटपट गँगाजी में धोया और अपनी गन्दी सी झोली में उसे डाल, मुझे वहीं भयाक्रान्त और प्रकम्पित छोड़, चम्पत हो ली! मुझे ठीक स्मरण नहीं कि उस भयावह बारिश में मैं ट्रेन तक कैसे पहुँचा, मगर तब तक ट्रेन सरकने लगी थी, टिकट खरीदने का न तो वख़्त था न ही पास में पैसे, बस घर पहुँचने की अदम्य इच्छा भर रह गई थी जिस कारण मैं ट्रेन के आखिरी डब्बे में लटक कर सवार तो हो गया पर तभी चील की तरह झपट्टा मार कर वे दोनों एक दरवाज़े से अन्दर घुसीं और मेरी गोद में अपना चीकट थैला फेंकते हुये दूसरे गेट से बाहर कूद गयीं. तुम्हें याद होगा कि बरारी से खुल कर वह ट्रेन थोड़ी दूर पर ही आकर रुक जाती थी. वहाँ बड़ा विचित्र नज़ारा दिखा. बहुत से लोग मिल कर इन दोनों शैतान की ख़ालाओं की ज़बरदस्त धुनाई कर रहे थे और ये क़रीब-क़रीब नंगी खड़ी होकर, बेहिसाब गालियाँ देते हुये, अपनी तलाशी दिलवा रही थीं. उनमें जो सबसे निर्दयतापूर्वक उन्हें पीट रहा था, वह मेरे पड़ोस में रहने वाला एक मुस्टण्ड सिपाही था, जो उसी रात किसी साँप के काटने से तड़प-तड़प कर मर गया. घर आने के बाद, अपनी झोली सहित वह खोपड़ी मुझसे लेकर, इन चुड़ैलों ने क्या-क्या गुल खिलाये होंगे, यह सब तुम्हारी कल्पना के लिये छोड़ देता हूँ पर तुम्हारी किताब पढ़ते वख़्त वे सब दिन मुझे फिर से याद आ गये. वह खोपड़ी मुझे स्वामी सत्यानन्द सरस्वती से परिचय होने के पहले, यानी मेरे किशोरवय की दहलीज़ पर पैर रखने, तक गाहे बेगाहे डराती रही थी.
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ऋषिकेश के प्रख्यात स्वामी शिवानन्द जी के लब्धप्रतिष्ठित शिष्य थे जिन्होने मुँगेर में बिहार स्कूल ऑफ योग की स्थापना से पहले भागलपुर के शिव भवन में अपना निवास रखा था. वहाँ शाम के संकीर्तन में हम सब बच्चे नियमित रुप से भाग लेते थे. स्वामी जी के प्रति मेरा आकर्षण सन्मोहन की हदों को छूने लगा था. शायद मेरी जिज्ञासु प्रवृति या उनके प्रति अनन्य श्रद्धा ने उन्हे मेरी उपस्थिति के प्रति सजग किया होगा. उन्हे भी मैं पसन्द आने लगा था, इसका पता उनकी करुणा भरी दृष्टि से चल जाता था. एक दिन उन्होंने सात्विक, राजसिक और तामसिक शक्तियों के बारे में प्रवचन दिया जिसका सार यह था कि वैसे तो संसार में तीनों प्रकार की सिद्धियाँ बिखरी पड़ीं हैं और ये सिद्धियाँ बिना अधिक प्रयास के सिद्ध भी हो जाती हैं पर इनको सिद्ध करने से साधक को कोई लाभ नहीं होता, अलबत्ता उसकी मृत्यु कष्टप्रद होने की संभावना बढने के साथ-साथ उसकी मुक्ति का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है. फिर इन तीनों में भी मात्र सात्विक सिद्धियाँ ही सबसे कम हानिकारक हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर अन्य दोनों को सदा से पछाड़ती आयी हैं क्योंकि उनमे स्वार्थ नहीं होता. उन्होनें हनुमान जी और अन्य कई उदाहरणों से अपनी बात सामने रखी. उस पूरे प्रवचन के दौरान वे सिर्फ मुझे ही देखते रहे. प्रवचन के बाद जब उन्होंने सबों से आँखें बन्द करके दुर्गा जी के बत्तीस नामों के उच्चारण करवाये तो मुझे लगा कि वे दोनों बहनें उसी खोपड़ी में घुस कर दम घुट जाने से बेहोश हो गयीं हैं और दुर्गा जी का वाहन सिंह उस खोपड़ी से जैसे फुटबॉल खेल कर उसे तहस नहस किये दे रहा है. फिर जैसे कोई बम ज़ोर से फटे वैसे ही वह खोपड़ी फटी और आतिशबाज़ी बन कर आकाश में बिखर गयी. मुझे सीने पर ज़ोरों का झटका लगा और मुझे कुछ वैसा हो गया कि शायद मैं बहुत देर तक पानी में डूबा रह कर बाहर निकाला गया हूँ. मैं बेहोश सा हो गया था, कैसे घर पहुँचा यह याद नहीं पर यह ख़ूब याद है कि मुझे ज़ोरों कि उबकाई आई और फिर मेरे मुँह से काला और गाढ़े लाल रंग का कुछ थक्का सा निकला जिसके साथ एक चितकबरी कौड़ी भी निकली और मैं एकदम जैसे मुक्त होकर प्रफुल्लित हो गया. उस सारी रात कोई मेरे कानों में कभी हनुमान चालीसा और गायत्री मन्त्र का पाठ करता रहा. स्वामी जी से अगली सुबह जब चर्चा की तो उन्होनें समझाया कि वे दोनों बहनें मेरी रक्षा ही करना चाहती थीं लेकिन उनका रास्ता मेरी सात्विक प्रवृति के लिये बिलकुल शुद्ध नहीं था. जो भी उन्होंने सीखा था वह बेहद नीचे स्तर की ताँत्रिक क्रियाएँ थीं, और उनके मेरे जीवन से चले जाने के बाद वह कौड़ी मेरे लिये दवा के बदले ज़हर बनती जा रही थी, अच्छा हुआ, निकल गयी. स्वामी जी से मैनें बहुत सारी यौगिक क्रियाओं के अलावा मँत्र, प्रार्थनाएँ और श्लोक भी सीखे, और उन्हीं के सामने मैनें मँत्रों को जाग्रत होते भी देखा.  
मेरे यज्ञोपवीत संस्कार के बाद मैं एक बहुत अच्छे गृहस्थ योगिनी के सम्पर्क में आया, श्रीमती चक्रवर्ती, जिन्हे हम सब नानी कहते थे. पुराने फ़ायर ब्रिगेड के दफ़्तर के पास अपने पति, बेटी और एक बेटे के साथ वे रहती थीं. जबसे उनका एक नौजवान बेटा गुज़र गया था तब से वे पूरी तरह पूजा पाठ को समर्पित हो गयी थीं. उनको देख कर मैनें चण्डी पाठ की विधि, सन्धि पूजा और निशा पूजा सीखी. उनके आशीर्वाद से मेरा ध्यान और गहरा होने लगा. तब मुझे माँ के विभिन्न रुप अन्दर तक अनुभव होते. पहली बार पता चला कि माँ सरस्वती की सवारी हँस और माँ दुर्गा की सवारी सिंह का अर्थ क्या है? सिंह में भी सोऽहम और हँस में हँऽसो! एक में शक्ति और दूसरी में विद्या की आराधना. अजपा-जप चलना एकदम से अपने आप प्रारंभ हो गया. आँखो को बन्द करते ही आज्ञा चक्र में प्रकाश का अनुभव होता.
सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था कि अचानक मेरे पापा को आँखों का भयंकर रोग लगा और थोड़े ही दिनों में उनके साथ-साथ मेरी दुनिया भी अन्धेरी हो गई. तब मेरी भगवान, पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान आदि सब से श्रद्धा ख़त्म हो गई. सारी धार्मिक किताबें लपेट कर मैनें उठा कर ताखे पर रख दी और मार्क्सवादी साहित्य तथा पाश्चात दर्शन की पुस्तकें मैं कॉम्युनिस्टों वाली श्रद्धा से पढ़ने लगा. हिन्दू धर्म और भगवान के विरुद्ध जो कुछ भी कहीँ पढ़ने को मिल जाता उसे मैं हृदयंगम कर लेता और उसके आधार पर मैं अच्छे-अच्छे विद्वानों की किरकिरी करके ही उठता. छात्र आन्दोलन के दौरान मैं पटना में जेल भी गया जहाँ कई नक्सलवादी नेताओं से मिल कर मेरा मन कर्मकाण्ड और पूजा-पाठ के प्रति और भी वितृष्णा से भर गया. वहाँ मैने बहुत शिद्दत से अपनी सँस्कृति को पानी पी-पी कर कोसा. आश्चर्य देखो कि वहाँ बिलकुल न चाहते हुये भी मैं ज्योतिषी के रुप में अचानक लोकप्रिय हो गया. वहीं एक उड़िया साधक भी मिला जिसे नरबली देने का प्रयास करते हुये माईथान (चिरकुण्डा-झारखण्ड) के पास रंगे हाथों पकड़ा गया था. दरअसल वह था तारापीठ का बँगाली पर उसकी सारी साधना उड़ीसा में किसी जँगल में आदिवासी गुरु के साथ हुई थी. उसकी सिद्धियाँ देखते हुये यह बड़े ताज्जुब की बात थी कि उसे गिरफ्तार किया जा सका था क्योंकि उसे सम्मोहन विद्या पर तो निश्चित रुप से बड़ा अधिकार था. पर उसने मुझे समझाया कि मारण, मोहन, उच्चाटन जैसे नीच प्रयोग अधिकतर उन लोगों पर ही सफल हो पाते हैं जिनका मन भ्रमित, भयभीत, असुरक्षित या कमज़ोर होता है या फिर जो अपनी आत्मा की शुद्धि के लिये प्रयत्नशील नहीं रहते या फिर माता-पिता की अवज्ञा करने के कारण उनके आशीर्वाद का अभेद्य सुरक्षा कवच भी टूट जाता है. वैसे लोग भी इन प्रयोगों के आसानी से शिकार हो जाते हैं जिनके अच्छे संस्कार धीरे-धीरे छूटने लगते हैं. लेकिन जब मैंने उससे कौतूहल वश कुछ सीखना चाहा तो उसकी एक बात मुझे बहुत मर्मस्पर्शी लगी थी. उसने कहा कि इस राह पर एक बार आ जाना कौमार्य भंग हो जाने के जैसा है जो दोबारा वापस आ ही नहीं सकता, जैसे एक बार बेईमानी का कीचड़ पाँवों में लग जाये तो लाख धोने पर भी नहीं धोया जा सकता, वैसा ही यह पथ भी है, इस पर चलना अपनी मुक्ति से और थोड़ी देर के लिये बिछुड़ना भर है. याद रख कि हम सबों को मुक्त तो होना ही है, बस माया के कारण वह पास और दूर आती जाती दिखती रहती है. इसलिये बेटा, माता-पिता और अन्य गुरुजनों  की निःस्वार्थ सेवा कर, कभी भी सात्विक साधना पथ से विचलित मत हो, मन, वचन और कर्म से ईमानदारी का दामन कभी मत छोड़ और भी सुन, जो सब कुछ प्रभु पर छोड़ कर सात्विक मार्ग पर धीरज से चलते रहते हैं उन्हें राग-द्वेष का पर्दा अपने आप हट जाने से प्रभु की कृपा का सतत अनुभव होने लगता है. एक बड़ा अच्छा उदाहरण भी उसने दिया था, कहा था कि जल की मछली को पानी के होने का और हमें हवा के होने का अनुभव तभी होता है जब ये नहीं होते या कम होने लगते हैं. प्रभु की कृपा इन सब से बड़ी और सार्वभौमिक है इसलिये हम जब तक बहुत सजग और चैतन्य नहीं होते तब तक हममें प्रभु और उसकी रचनाओं के प्रति चेतना तथा कृतज्ञता आ ही नहीं सकती और अहंकार का चश्मा लगा कर हम मरीचिका के पीछे भागते ही रहते हैं. उसकी दुनिया के बारे में और अधिक जानने/सीखने की मेरी उत्कण्ठा पर उसने एक बात और कही थी कि उस दुनिया को जो भी ठीक से जानता है, वह उसके बारे में वह बता ही नहीं सकता और जो बताता है उसे उस दुनिया के बारे में पूरी तौर पर पता ही नहीं होता क्योंकि वहाँ के अनुभव ज्ञानेन्द्रियों के तल पर नहीं होते और इस दुनिया के शब्दकोष में उन अनुभवों के लिये शब्द नहीं होते. इस लिये वहाँ अनुभव ही सब कुछ है, कुछ-कुछ गूँगे के गुड़ जैसा. नगद पैसे देकर बातों-बातों में ही हवा से मनवांछित वस्तु पैदा कर देने वाले, ताज़ा बेमौसमी फलों और एकदम गरमागरम समोसों से मेरा स्वागत करने वाले इस झक्की औघड़ के आग्रह के कारण ही मैं बाद में पुरी जाकर बाबा जगन्नाथ के और गोहाटी जाकर माँ कामाख्या के दर्शन कर सका था. वह कहानी भी विचित्र है पर वह कभी फिर सही.
जिस दिन मैं पटना के जेल से छूटा, उसी दिन पटना में रॉटरैक्ट क्लब का बड़ा आयोजन था जहाँ मैं भी चला गया. वहाँ आकाशवाणी के दो कलाकार फिल्मी गाना गा रहे थे. मैं बड़ा उचाट सा बैठा था तभी उन लोगों ने एक गाना शुरु किया, "कोरा काग़ज़ था मन मेरा" जिसमें बाँसुरी का बड़ा अच्छा प्रयोग किया गया था. गीत के बीच में बाँसुरी बजते ही मुझ पर तंद्रा सी छा गयी. न जाने कितने पिछले जन्मों की सुधि उन कुछ पलों में हुई कि बता नहीं सकता. जब मैं तुम्हारी पुस्तक में कामायोगिनी द्वारा कुँवर को षटशक्ति चक्र नृत्य के बारे में दिये गये ज्ञान के बारे में पढ़ रहा था तो मुझे उस पटना जेल से छूटने वाले उस दिन की बेसाख़्ता याद आई जिसके बाद मेरी पुरानी दुनिया जैसे मुझे फिर से मिल गई थी और भागलपुर आते ही मैं फिर से अपनी साधना में लग गया था. तुमने बहुत ही सहज रुप से कहलवा दिया है कि जागरण चक्रों का नहीं चेतना का होता है. यह इतनी बड़ी बात है कि जिसे बिना सद् गुरु की कृपा के समझने में सारा जीवन भी कम पड़ जाता है और तुमने सूत्र जैसे एक ही वाक्य में सारा भेद खोल कर रख दिया है. तुम्हारी कामायोगिनी है विदुषी जिसे सभी सम्प्रदायों के सभी तंत्रों एवं उपतंत्रों का ज्ञान है. उसका ज्ञान मुझे उसके कालखण्ड से भी परे लगता है.  मेरे एक ज्ञानी मित्र का कथन है कि अभी भी देश में कम से कम तैंतीस प्रकार की गीतायें उपलबद्ध हैं. उनकी कृपा से मैने भी सब की सब एक बार पढ़ ली हैं. मुझे यह तो पता नहीं कि महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को क्या कहा होगा या फिर ऋषि वशिष्ठ ने भगवान राम को क्या सिखाया होगा पर गीता लिखने वाले व्यास और योग वाशिष्ठ रचने वाले में मेरी अगाध श्रद्धा है क्योंकि उधार का सही, वह ज्ञानामृत आम जनों तक तो उन्ही की लेखनी के कारण सहज ही ग्राह्य भाषा में पहुँच सका है. इसी प्रकार तुम्हारे हर चरित्र से तुम्हारे ज्ञान का ही बोध होता है, साथ ही तुम्हारी शोधपरक प्रवृति के प्रति अनायास श्रद्धा भी.
बात तो मैं अपनी कर रहा था, देखो फिर कहाँ भटक गया. हाँ, उन्ही दिनों मेरी तुमसे पहली मुलाक़ात हुई थी और तुम मुझे बेहद ज़हीन लगे थे, अपनी पीढ़ी में सबसे अलग और शायद सबसे प्रखर भी. दुर्भाग़्यवश मैं भागलपुर में अपनी दुनिया में इतना व्यस्त रह गया कि तुम्हारी फोटोग्राफी की दक्षता के अतिरिक्त अन्य विधाओं में भी पारंगत होने की बात तब समझ ही नहीं सका था. तुम भी तो अपनी बजाय अपने मित्रों की चर्चा करके ही खुश होते रहते थे! तुम्हारे कलाकार मित्र नागेश जी से भी मैं बड़ा प्रभावित हुआ था. शायद तुम्हें स्मरण हो कि मैने फोटोग्राफी और विभिन्न प्रकार के कैमरों पर तुमसे रॉटरैक्ट क्लब में भाषण भी दिलवाया था जो बड़ा सफल रहा था. बाद में भवन निर्माण में तुम्हारी गंभीर अभिरुचि भी मुझे बहुत अच्छी लगी थी, शायद बच्चों का स्कूल बनवा रहे थे तुम. तुम्हारे पिता जी के प्रति मेरी श्रद्धा असीम थी ही.
मगर बात तो मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा की कर रहा था. उस काल खण्ड में मैं जिन आध्यात्मिक लोगों के सम्पर्क में आया उनमें श्री कलाधर मिश्र (मेरे चचेरे फूफा), मेरे मंत्र गुरु-स्वामी हरिहरानन्द गिरी जी महाराज (पहाड़ी बाबा), उनके शिष्य शंख बाबा और इनके अतिरिक्त श्री दुर्ग़ा पाठक जैसे तांत्रिकों के नाम मन में एकदम से कौंध जाते हैं. हीरु को भी ये लोग अवश्य याद होंगे. किसी ने मुझे क्रिया सिखाई तो कहीं से आसन, प्राणायाम, मुद्रायें, बन्ध और साधना की पगडंडी पकड़ में आ गई. पहाड़ी बाबा से ही दीपावली की मध्य रात्रि में, बड़हड़वा के आश्रम में मेरी क्रिया-योग की मंत्र दीक्षा हुई थी, जिसके चालीस वर्ष से भी अधिक समय होने के बाद भी वह कल की ही रात लगती है, आस्था और विश्वास से भरी और तारों के उजास से भरी रात. मुझ जैसे अकिंचन को भी चिरजीवी बाबाजी का अनुभव इन्ही लोगों की अक्षुण्ण कृपा के कारण हुआ है. ये सभी लोग आज पृथ्वी पर शरीर के रुप में नहीं हैं लेकिन किसी भी तारों से भरी रात में आकाश से बरसते इनके आशीर्वाद को कभी भी अनुभव किया जा सकता है, बस मन ख़ाली और प्रस्तुत होना होता है, कृपा की कमी तो है ही नहीं. इन लोगों के कारण मैं अशरीरी दुनिया को अच्छी तरह समझ सका था. मेरे पिता तुल्य गुरु भाई, श्री मदन मोहन सहाय, आज भी (अगस्त 2010) पटना में रह कर घोर साधना में लीन हैं. हीरु शायद उनका पता जानता हो. कभी मन में आये तो मिल आना.
कई वर्ष पहले, अपना शरीर छोड़ने से कुछ पहले, पहाड़ी बाबा ने कहा था कि मेरी साधना अधूरी नहीं रहेगी और मुझे वे किसी न किसी रुप में अवश्य दिशा निर्देश देते रहेंगे. नौकरी के क्रम में मैं बहुत घूमा हूँ, अपने लिये गुरु की तलाश भी बहुत की है, चारो धाम, कई ज्योतिर्लिंग, कई कुम्भ स्नान, बहुत से शक्ति पीठ और ढ़ेर सारे सिद्ध स्थलों का भ्रमण और कई दिव्य आत्माओं के दर्शन के अवसर भी प्राप्त हुये देश में आज जिन किसी भी सन्त महात्मा का नाम श्रद्धा से लिया जाता है, सबों की करुणा से मैं सराबोर हुआ हूँ, आकण्ठ तृप्ति का अनुभव किया है मैने उन सबों के साहुज्य में. पर मुझे सबसे अच्छा लगा "आर्ट ऑफ लिविंग" में आकर जहाँ सुदर्शन क्रिया के अतिरिक्त मैने पद्मसाधना सीखी. मुझे लगने लगा कि हर ऐसे स्थान की अपनी गरिमा और अपना दिव्य अनुभव है. चाहे वह मंदिर हो, या गिरजा घर या कोई दरगाह या फिर किसी पारसी या यहूदी का पूजा स्थल, सबों के अन्दर से एक आवाज़ हम दोनो पति-पत्नी ने अवश्य सुनी कि मैं हूँ! बहुत इधर-उधर ताकने की ज़रुरत नहीं है, अपने अन्दर ही देख लो और वहाँ देख पाने का समर्थ अभी न हुआ हो (क्योंकि बिना तुम्हारी पूरी तैयारी के मैं अपने को देखने की वह दिव्य दृष्टि देता ही नहीं) तो प्रकृति के पाँचो तत्वों में मुझे देख लो. आस-पास के मजलूसों में मुझे देख लो, अपनी माँ और अपने पिता में मुझे देख लो. क्योंकि मैं कहाँ नहीं हूँ क्योंकि मैं बाहर कहीं भी नहीं हूँ.
यह वाक्य अक्षरशः बाबा मेंही दास के पास खड़े होने से ही मेरे कानों में हर बार गूँजा है. बाबा वैद्यनाथ के लिये काँवर लेकर चलते समय हर वर्ष, और कई वर्षों तक, यही वाक्य मुझसे किसी न किसी के माध्यम से कहा जाता रहा है, ताकि मैं माया के जाल में उलझ कर न रह जाऊँ. और देखो कैसा ज्ञानपापी हूँ मैं - अब बोध हुआ कि तुम्हारी माया में फँस कर इतना कुछ लिख गया हूँ, वह सब भी जो अज्ञात और अनावश्यक था. जितना कुछ तुम्हारे काम का लगे व्यवहार में लाना, शेष को सड़ा-गला समझ कर फेंक देना. लिखने के बाद दोबारा पढ़ने की हिम्मत मुझमें नहीं है. वर्तनी और व्याकरण की भूल सुधारने से लेकर काटने छाँटने और कुछ भी अल्लम-गल्लम लिख कर मेरे नाम पेल देने का अधिकार भी इस पत्र के माध्यम से तुम्हें देता हूँ. मीठा-मीठा सब तुम्हारा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू सब मेरे उपर!
अन्त में एक बात कहता हूँ. तुम्हारे इस महान उपन्यास के ढ़ेर सारे पात्रों की शिकायत है कि तुम किसी सड़ियल और हाईली फ्रस्ट्रेटेड स्कूल मास्टर जी की तरह जब तब उन्हे "नतजानु" करा देते हो. इससे अच्छा था कि तुम उन्हे सदा वज्रासन में ही रखते या उनकी दोनों टाँगे ही काट देते तब उन्हे नतजानु होने में इतना कष्ट नहीं होता और न तुम तक मुझे उनकी व्यथा पहुँचानी पड़ती. बहरहाल इतने दिनों की सरकारी नौकरी के अनुभवों ने मुझे आश्वासन देने की कला में पारंगत बना दिया था, इसलिये उन्हें अतिशीघ्रप्रकाश्य अगले संस्करण में समुचित संशोधन का वायदा करके फिलहाल शान्त दिया है. हिन्दी पाठकों की अभिरुचि देख कर मुझे लगता है कि यह पुस्तक गंभीरता से ली जायेगी. इन हालात में यही मुनासिब होगा कि तुम भी अपने पात्रों से किया गया मेरा वायदा गंभीरता से लो क्योंकि तुम्हारी अज़मत और फितरत दोनो मैं दाँव पर लगा आया हूँ.
तुम्हारी मुहब्बत के बोझ से अधमरा तुम्हारा दोस्त
उदय
पुनःश्चः- इतनी अच्छी किताब लिख कर तुमने अपने माता-पिता का दिया "रंजन" नाम सार्थक कर दिया है. श्रद्धेय चाचाजी आज हमारे बीच होते तो उन्हे भी शायद "रंज" "न" हुआ होता!

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