ईंट-गारे का मकान या लोकतंत्र का मंदिर ?

राजस्थान विधान सभा में भी चप्पल चली  - इसे महज एक खबर की दृष्टि से न देखें तो इसके कई मायने हैं . इस देश में जब कोई सत्याग्रह करता है तो सरकार कहती है ये संसदीय गरिमा को चोट पंहुचा सकता है. राजनेताओं का ये व्यवहार क्या साबित करता है?  ये संसद या विधानसभा को सिर्फ ईंट-गारे  का मकान समझते हैं या लोकतंत्र का मंदिर ?

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