मेस के खराब खाने की पहली कहानी नहीं है ये! किस्से और भी हैं - रीवा सिंह

मेस के खराब खाने की पहली कहानी नहीं है ये! किस्से और भी हैं...- रीवा सिंह 
कॉन्स्टेबल तेज बहादुर ने वीडियो के जरिए प्रशासन को आईना दिखा दिया। उन्होंने देश की हुकूमत पर कोई सवाल नहीं उठाया। सैनिक को दी जाने वाली सुविधाओं पर कोई शंका नहीं जतायी। उन्होंने पूछा कि लगातार 12 घंटे खड़ा रहने वाला सिपाही दाल रोटी खाकर कैसे जीवित रहेगा! साक्ष्यों के साथ अपनी बात रखी। दाल-रोटी, चाय-पराठा सब आपकी ख़िदमत में पेश किया। उसके बाद मामला ये बना कि तेज बहादुर ड्यूटी से गायब रहते हैं। तेज बहादुर का पुराना रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। तेज बहादुर की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है।
हे तात्! आप ही इस विषय पर प्रकाश डालें और बताएं कि किसी की अनुपस्थिति से या बुरे रिकॉर्ड से एक समूचे प्लाटून के भोजन का क्या लेना-देना है?
मोदी जी के डिजिटल इंडिया का प्रमाण देते हुए सीमा सुरक्षा बल के 29वीं वाहिनी के एक सिपाही ने हिम्मत कर के एक संदेश देश के नाम दिया तो इस बात की जांच होने लगी कि ड्यूटी के वक्त उसके पास मोबाइल कैसे था!
ऐसा नहीं है कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि उनके साथ क्या हो सकता है। पर बेबसी जब एकत्रित होती है तो हिममत बन जाती है और फिर अंजाम का खतरा नहीं रहता। आप में से कई लोग सीधे सरकार पर निशाना लगा रहे हैं जबकि वाकई इसके लिए सरकार दोषी नहीं है। दोष हर स्तर पर बंटा हुआ है।
सभी मिलिट्री और पैरा-मिलिट्री बल के लोग विभिन्न बटालियन (वाहिनी) और फिर कम्पनी व प्लाटून में बंटे होते हैं। हर प्लाटून का एक ठिकाना होता है जहां उसे कुछ तय दिनों की सेवा देनी पड़ती है (किसी घटना या आपातकाल की स्थिति में फेर-बदल हो जाती है)। इस दौरान हर प्लाटून का एक मेस होता है जिसमें सभी के लिए भोजन की व्यवस्था होती है। उस मेस का एक इनचार्ज होता है जो कभी वरिष्ठता के आधार पर, कभी कमांडर की खुशामदी के आधार पर तो कभी एक डिब्बे मिठाई और कुछ नोटों के आधार पर बनाया जाता है। अगर मेस इनचार्ज अच्छा निकला तो सैनिक खुश रहते हैं क्योंकि तय राशि के अनुरूप उन्हें भोजन मिलता है। अगर वो ठीक नहीं है तो ज़ाहिर है कुछ घालमेल होना है। होता ये है कि सभी की तनख्वाह से पैसे उतने ही कटते हैं इसलिए इनचार्ज को रसोई के लिए उसी के मुताबिक पैसे मिलते हैं। वो अब इसमें कैसे अपने लिए पैसे निकाल लेता है और कैसे कमांडर के हिस्से का भी बचा लेता है ये उसकी चतुराई पर निर्भर करता है। इससे नुकसान सिर्फ़ वहां ड्यूटी कर रहे सिपाहियों का होता है क्योंकि उन्हें पता है सरकार उन्हें बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा रही है, पर वो उनतक आने से पहले ही मिस्टर इंडिया हो जाती हैं। स्कीम के अनुसार सभी के वेतन में फल-सेवन के भी पैसे जुड़े होते हैं। अब वो उसका फल खाएं या खेत जोतें ये उनकी मर्ज़ी है। सरकार चाहें किसी भी दल की हो, सेना के लिए कुछ तय मापदंड हैं जिनमें कोई फेरबदल नहीं किया जाता। उसके बाद दूसरी कड़ी आती है प्रशासन की, यहां से लोग दिमाग लगाना शुरू करते हैं। सरकार हरिश्चंद नहीं है पर यकीन मानें सभी सैनिकों के मेस में उतना घटिया खाना नहीं मिल रहा। अगर ऐसा महज़ कुछ प्लाटूनों या कुछ बटालियनों में भी हो रहा है तो संसद में बैठे लोग इतने भर से नहीं कमा लेंगे। इससे जेबें भरती हैं प्रशासन की।
हमारे यहां हर पुलिस चौकी की बिक्री होती है। 10-20 लाख रुपये में एक दरोगा थानेदार बनता है। इतने पैसे देने के बाद वो ठेले-रेहड़ी वालों से लेकर ट्रक वालों तक से वसूली करता है और अपनी खाली तिजोरी भरता है। और हां, अगर आला अधिकारी को भोग लगाना भूल गया तो चौकी छिन जाएगी। देश के जवानों पर आप फिल्में बनाते हैं, देखते हैं और रो पड़ते हैं न! एक बेईमान कमांडर आ जाए तो बिना एक डब्बा मिठाई और एक हज़ार रुपये के इन जवानों को छुट्टी नसीब नहीं होती है।
एक और किस्सा सुनिए। सन् 1998 की बात है। 26वीं वाहिनी पीएसी गोरखपुर की घटना है। एक सिपाही जिनका नाम है राज किशोर यादव, उनके दिल का वॉल्व खराब हो गया था। उनका रिकॉर्ड शुरू से अच्छा था, बहुत ही सरल व्यक्ति थे। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए एक लाख रुपये मांगे। आप कल्पना करें तो समझ पाएंगे कि 1990 के दशक में एक सिपाही के पास अचानक से एक लाख रुपये कहां से आएंगे। ईश्वर की कृपा से वो बचत में बहुत अच्छे थे और उनके जी पी एफ (ये एक प्रोविडेंट फंड है जिसमें कर्मचारी अपने वेतन से कुछ पैसा देता है और उसके अनुरूप सरकार की तरफ से कुछ पैसे खाते में जाते हैं) में इतने रुपये थे। वो सिपाही जिनका परिवार आधी ज़िंदगी रीसते हुए सरकारी मकानों में बिता देता है और बाकी आधी ज़िंदगी खुद की छत तैयार करने में, ये जीपीएफ के पैसे विशेष कार्यों में ही निकालते हैं। जैसे बेटी का ब्याह या घर के निर्माण के लिए। इसे निकालने के लिए 20 दिन से एक महीने पहले तक आवेदन करना होता है। राज किशोर ने आवेदन किया। वो बिस्तर पर पड़ गए थे और उनके पैसे खाते से नहीं निकल रहे थे। हर रोज़ उनके यहां लोगों की भीड़ आने लगी। सबको उनकी हालत और प्रशासन की ढीलाई दिख रही थी। सब उन्हें हौसला देते और बाद में बातें करते कि शायद ही बच सकें। कई बार कार्यालय में बात की गई। सरकारी बाबू और बटालियन के कमांडेंट के बीच ही मामला फंसा हुआ था। किसी ने यह समझने की ज़हमत न उठायी कि उनके ऑपरेशन में देरी हो रही है। मामला सरकारी गति से चलता रहा और उनकी हालत खराब होती रही। राज किशोर यादव के खाते में पैसे पड़े रह गए और उनका देहांत हो गया। उसके कुछ दिनों बाद पैसे भी निकल आए। ये पैसे किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पास नहीं अटके थे। इन्हें एक कमांडेंट के हस्ताक्षर और सरकारी बाबू की दरियादिली की दरकार थी। पर सबने मिलकर इसे सरकारी कामकाज बनाए रखा। उस समय उनके बच्चे बहुत छोटे थे और उनकी पत्नी बहुत पढ़ी लिखी नहीं थीं इसलिए उन्हें बटालियन के मेस में खाना बनाने का काम मिल गया।
मेस में खराब खाना परोसे जाने की ख़बर मैंने पहली बार नहीं सुनी। ये मामले कई बार उठाए जाते रहे हैं, हर बार आप तक बात नहीं पहुंच सकी। गोरखपुर के उसी बटालियन के एक कंपनी कमांडर अशोक सिंह भी कुछ ऐसा ही करते थे। उनके खिलाफ़ करीब 13 सिपाहियों ने आवाज़ उठाई। उन सभी का रिकॉर्ड हमेशा से अच्छा था पर उनके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज हुए। उन सभी को सस्पेंड किया गया। उनपर गुटबाज़ी का आरोप लगा और अत्यधिक मेडिकल छुट्टियां लेने की बात भी सामने आयी। प्रथम दृष्टया वो सभी लोग निर्दोष साबित हुए पर बाद में रिकॉर्ड्स बने और इन सभी को विभिन्न बटालियनों में और फिर नक्सलवादी इलाके में भेज दिया गया। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा और करीब 5 साल बाद सारे आरोप बेबुनियाद साबित हुए। कम्पनी कमांडर अशोक सिंह 2 साल के लिए सस्पेंड हुए। बाद में एड्स से उनकी मृत्यु हो गई। वो पांच साल कितनी जिल्लतें भरी रही होंगी ये उन सिपाहियों के परिवारों से पूछिये। सभी को पता था कि गलत हुआ है पर फिर भी लोग मुंह उठाकर सवाल और हमदर्दी ले आते थे - आपके पति पर तो आरोप लगा है न! बहुत बुरा हुआ। मैंने बहुत करीब से देखा है ये सबकुछ।
हमारे घर पर पिछले साल कुछ होनहारों ने हमला किया। घर के ठीक बाहर दोस्त की कार पड़ी थी, उसपर तोड़फोड़ की। घर के बाहर शराब की बोतलें फेंकी गईं और ये सब तब जब मेरे पिता खुद उत्तर प्रदेश पुलिस के कर्मचारी हैं। शिकायत दर्ज करायी गई। आश्वासन मिलते थे पर कुछ ठीक नहीं होता था, क्योंकि हमला करने वाले वो जांबाज कच्चे शराब का धंधा करते थे और इसके लिए एक मुश्त रकम चौकी को भेंट की जाती थी। जब सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस ने मामले में हस्तक्षेप किया, डैडी और उनके दोस्त ने दरोगा को झाड़ लगायी तब बात बनी। हमें खुद इंसाफ पाने के लिए पहले जासूस बनना पड़ा, मामले की छानबीन करनी पड़ी कि कार्यवायी क्यों नहीं हो रही है। इसके बाद कुछ हुआ। हर कोई एसपी तक पहुंचने की न सोचता है और न हिम्मत जुटाता है। इंसाफ का तराजू जज साहब के दरबार में पड़ा रह जाता है और इंसाफ के साथ हर कदम पर समझौता होता चला जाता है।
तेज बहादुर को अंदाज़ा होगा कि उन्हें इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है पर यकीन मानिए, एक समय के बाद इंसान इतना ऊब चुका होता है कि उसे डर लगना बंद हो जाता है और वो सवाल लेकर खड़ा हो जाता है। आप इस स्थिति में उसे मानसिक रोगी कहकर बच सकते हैं।

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